Saturday, March 21, 2015

ईन्तज़ार

मै क्यू इन्तज़ार करती हूँ तुम्हारा,
ट्क ट्की लगाए, क्यू मै, बैठी रहती हूँ,
सुबह शाम अपने झरोखे मे इस इन्तज़ार
मे कि तुम आओगे
पर तुम नही आते!!
तुम क्यू नही आते इसका पता
तो नही मुझे पर इतना पता है,
कि मै, जिस शिद्द्त से तुम्हारा इन्तज़ार
कर रही हू तुम आओगे ज़रुर,
इसका मुझे पता है।
मैने ज़िद ठानी है,
तुम आओगे, ज़रूर आओगे।
विशाखा…………


Saturday, March 9, 2013

शब्दों का तानाबाना 

मैं कुछ कहना नहीं चाहती ,
शब्दों  का तानाबाना बड़ा उलझाता है, जाल बुनता है,
फिर फांस लेता है, मैं चुप रहना चाहती हूँ।

चुप्पी का अर्थ गहराई में गोते लगाना है, शब्दों के बुनावट,
उसकी कसीदाकारी में उतरना है।

मैं अभिमन्यु बनती जा रही हूँ, जो कुरुक्षेत्र के मैदान
के बीच कौरवों से घिरा था, अपने ही बनाए चक्रव्यूह में फंसा था।
आज इस कुरुक्षेत्र और शब्दों के चक्रव्यूह, जो बनाए जाते हैं मेरे लिए
वह जो कौरवों की नारायणी सेना खड़ी होती है मेरे सामने!

एक आवाज़ आती है कानों में अस्वथामा हतो-वा (मारा गया)!!
और मैं टूट जाती हूँ गुरु द्रोण की तरह। वार किये जाते हैं,
फिर धराशायी हो जाती है एक  दीवार!
एक मजबूत स्तम्भ बचा है अभी, दृढ-प्रतिज्ञ योद्धा!
जो युगों से देखता आया है शब्दों के जाल को,
वह द्रिढनिश्चयी भी आज घायल हुआ!
वह लेटा रहा है, सदियों तक उस नुकीली शैया पर।

मैं कुछ कहना नहीं चाहती!!

विशाखा___________.
अहिल्या 

कुछ न कुछ बीतता जाता है, देखती परखती रहती हूँ खुद को
कितनी बातें कितनी मुलाकातें खुद के साथ।

हर बार न जाने कितने तीर चलते हैं सामने के मैदानों से,
मेरे सीने में चुभते हैं पर घायल नहीं कर पाते, हर ज़ख्म कहती है!
कि  ज़रा सुन उस तीर के पैने  नोक की आवाज़, जो हवा को भेदता हुआ
तुझ तक पहुंचा है, यह चुभन मुझे तब तक अहसास दिलाती रहेगी
जब-तक मेरे मुलायम ज़ख्म सूख नहीं जाते
और मैं मजबूत शिलास्ताम्भ नहीं बन जाती.
शिलास्ताम्भ बनकर मौन नहीं हो जाती।

आज इस छण से मैं परिपक्व हो रही हूँ।
मुझमें कहीं अहिल्या समा गयी है या मैं अहिल्या बन रही हूँ।
इस इंतज़ार में कि राम आयेंगे!!!!!!
हे राम !!!!!


विशाखा ______.

Sunday, August 12, 2012

आदिम रात्री की महक

आज सुबह से ही कुछ महक सी आती रही है,
शाम होने ही वाला है, बड़ी चहलकदमी सी है
हरतरफ !
चहलकदमी करती शाम न जाने कब बीत गयी,
कुछ अजीब सी चीख सुनाई दे गयी है अचानक !!
जैसे मै बिखर गयी होऊं, कुछ बह रहा हो
शरीर के ऊपर से मेरे. बहाव तेज़ !!
इतना तेज़ की शायद अब गयी तब गयी,
ओह !!!!!
रौंदी गयी हूँ, बहुत रौंदी गयी हूँ. अब पुराना
हो गया है सब.
एक धडकन सुनती हूँ.
घडी की नोक पर टंगे उस अंक को नापती
बीतती जाती हूँ, बीत जाने के सिवाय कुछ
नही बचता.
आदिम रात्री की महक, आदिम रात्री की महक,
किसकी है यह महक!!! वह जो है पर है ही नहीं!
मैं केवल एक महक बन गयी हूँ, अब वो भी नही.

मुझे गर्भ के अपने उस तल में समा ले !
हे सीते !!!!!!!!!!!!!

विशाखा ....

Friday, June 15, 2012

ज़िन्दगी

 
सूरज की  हर किरण गवाह है, पसीने के हर बूंद का,
 
जो गिरता है ज़मींन पर सींचता है, जीवन का हर कोना,
 
सूरज गवाह है, उन सुखी टहनियों का भी जो अकाल में
 
सूख गयी थी, पसीना भी वहीँ ठिठक गया था!!
 
उनकी सांसे रौंद जाती है, उन फटी हुई एंडियों सी जमींन को! 
 
सूरज की हर किरण गवाह है, उन बेतहासा पिघले सांसों का, 
 
जिसमे मन्नत में जलाये दीपक बहाए जाते हैं, जंगली सूखे फूल, और 
 
बचाकर रखे पसीने के चंद  बूंद से, शिव प्रतिमा पर अर्घ्य डाले जाते हैं.
 
सूरज की हर किरण से अलग है यह भोर देखो वहां.....................!! 
 
 
विशाखा ........
कुछ खामोश निगाहें dhundti  रहती है खुद को,
 
अँधेरे के सफ़ेद चादर के नीचे,अठखेलियाँ करती
उनकी चपलता,
 
खामोश हो आँखमिचौली खेलती है!!
 
 
विशाखा......

अनकही बात

 
रौशनी बेशुमार है, धरती पर
झुलसती जाती है, यहाँ चिताओं में कैद
मुर्दा शरीरें!!
बस बच निकलते हैं वो जिन्हें गंवारा नहीं
यह कोहराम!!
                                       विशाखा.....