Sunday, August 12, 2012

आदिम रात्री की महक

आज सुबह से ही कुछ महक सी आती रही है,
शाम होने ही वाला है, बड़ी चहलकदमी सी है
हरतरफ !
चहलकदमी करती शाम न जाने कब बीत गयी,
कुछ अजीब सी चीख सुनाई दे गयी है अचानक !!
जैसे मै बिखर गयी होऊं, कुछ बह रहा हो
शरीर के ऊपर से मेरे. बहाव तेज़ !!
इतना तेज़ की शायद अब गयी तब गयी,
ओह !!!!!
रौंदी गयी हूँ, बहुत रौंदी गयी हूँ. अब पुराना
हो गया है सब.
एक धडकन सुनती हूँ.
घडी की नोक पर टंगे उस अंक को नापती
बीतती जाती हूँ, बीत जाने के सिवाय कुछ
नही बचता.
आदिम रात्री की महक, आदिम रात्री की महक,
किसकी है यह महक!!! वह जो है पर है ही नहीं!
मैं केवल एक महक बन गयी हूँ, अब वो भी नही.

मुझे गर्भ के अपने उस तल में समा ले !
हे सीते !!!!!!!!!!!!!

विशाखा ....

Friday, June 15, 2012

ज़िन्दगी

 
सूरज की  हर किरण गवाह है, पसीने के हर बूंद का,
 
जो गिरता है ज़मींन पर सींचता है, जीवन का हर कोना,
 
सूरज गवाह है, उन सुखी टहनियों का भी जो अकाल में
 
सूख गयी थी, पसीना भी वहीँ ठिठक गया था!!
 
उनकी सांसे रौंद जाती है, उन फटी हुई एंडियों सी जमींन को! 
 
सूरज की हर किरण गवाह है, उन बेतहासा पिघले सांसों का, 
 
जिसमे मन्नत में जलाये दीपक बहाए जाते हैं, जंगली सूखे फूल, और 
 
बचाकर रखे पसीने के चंद  बूंद से, शिव प्रतिमा पर अर्घ्य डाले जाते हैं.
 
सूरज की हर किरण से अलग है यह भोर देखो वहां.....................!! 
 
 
विशाखा ........
कुछ खामोश निगाहें dhundti  रहती है खुद को,
 
अँधेरे के सफ़ेद चादर के नीचे,अठखेलियाँ करती
उनकी चपलता,
 
खामोश हो आँखमिचौली खेलती है!!
 
 
विशाखा......

अनकही बात

 
रौशनी बेशुमार है, धरती पर
झुलसती जाती है, यहाँ चिताओं में कैद
मुर्दा शरीरें!!
बस बच निकलते हैं वो जिन्हें गंवारा नहीं
यह कोहराम!!
                                       विशाखा.....
 
 

अहसास 'दूसरा'

हवाओं को जब तुम स्पर्श करोगे अँधेरे में 
पंख फर्फरायेगा वह परिंदों के झुरमुट सा!!
आ बैठेगा तुम्हारी दहलीज़ पर...
 
विशाखा.......

अहसास

 
कुछ धुआं-धुआं, कुछ पिघला सा दिखता है,
मौसम आज-कल!!
 
नज़र को धूल करता बीतता है हर लम्हा!!
 
 
विशाखा....