Friday, June 15, 2012

ज़िन्दगी

 
सूरज की  हर किरण गवाह है, पसीने के हर बूंद का,
 
जो गिरता है ज़मींन पर सींचता है, जीवन का हर कोना,
 
सूरज गवाह है, उन सुखी टहनियों का भी जो अकाल में
 
सूख गयी थी, पसीना भी वहीँ ठिठक गया था!!
 
उनकी सांसे रौंद जाती है, उन फटी हुई एंडियों सी जमींन को! 
 
सूरज की हर किरण गवाह है, उन बेतहासा पिघले सांसों का, 
 
जिसमे मन्नत में जलाये दीपक बहाए जाते हैं, जंगली सूखे फूल, और 
 
बचाकर रखे पसीने के चंद  बूंद से, शिव प्रतिमा पर अर्घ्य डाले जाते हैं.
 
सूरज की हर किरण से अलग है यह भोर देखो वहां.....................!! 
 
 
विशाखा ........
कुछ खामोश निगाहें dhundti  रहती है खुद को,
 
अँधेरे के सफ़ेद चादर के नीचे,अठखेलियाँ करती
उनकी चपलता,
 
खामोश हो आँखमिचौली खेलती है!!
 
 
विशाखा......

अनकही बात

 
रौशनी बेशुमार है, धरती पर
झुलसती जाती है, यहाँ चिताओं में कैद
मुर्दा शरीरें!!
बस बच निकलते हैं वो जिन्हें गंवारा नहीं
यह कोहराम!!
                                       विशाखा.....
 
 

अहसास 'दूसरा'

हवाओं को जब तुम स्पर्श करोगे अँधेरे में 
पंख फर्फरायेगा वह परिंदों के झुरमुट सा!!
आ बैठेगा तुम्हारी दहलीज़ पर...
 
विशाखा.......

अहसास

 
कुछ धुआं-धुआं, कुछ पिघला सा दिखता है,
मौसम आज-कल!!
 
नज़र को धूल करता बीतता है हर लम्हा!!
 
 
विशाखा....