Sunday, August 12, 2012

आदिम रात्री की महक

आज सुबह से ही कुछ महक सी आती रही है,
शाम होने ही वाला है, बड़ी चहलकदमी सी है
हरतरफ !
चहलकदमी करती शाम न जाने कब बीत गयी,
कुछ अजीब सी चीख सुनाई दे गयी है अचानक !!
जैसे मै बिखर गयी होऊं, कुछ बह रहा हो
शरीर के ऊपर से मेरे. बहाव तेज़ !!
इतना तेज़ की शायद अब गयी तब गयी,
ओह !!!!!
रौंदी गयी हूँ, बहुत रौंदी गयी हूँ. अब पुराना
हो गया है सब.
एक धडकन सुनती हूँ.
घडी की नोक पर टंगे उस अंक को नापती
बीतती जाती हूँ, बीत जाने के सिवाय कुछ
नही बचता.
आदिम रात्री की महक, आदिम रात्री की महक,
किसकी है यह महक!!! वह जो है पर है ही नहीं!
मैं केवल एक महक बन गयी हूँ, अब वो भी नही.

मुझे गर्भ के अपने उस तल में समा ले !
हे सीते !!!!!!!!!!!!!

विशाखा ....

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