एक सर्दी की सुबह कोहरे का घना घेरा चारो तरफ, मै निकली घर से,
आवाज़ आई ; कहाँ चली ? मैंने कहा पता नहीं, अभी तो कदम बढ़ाया है,
न रास्ते का पता है न मंजिल का, पता नहीं कहाँ जा रही हूँ, अब निकली हूँ
कहीं तो पहुँच ही जाउंगी.
मंजिल नहीं ठिकाने का भी पता नहीं कोहरे ने कहर बरपाया है.
असमंजस है, वह यह के कोहरा आखिर कहाँ है ? बड़ी देर बाद जब खुद को
देखा, खुद की खिड़की में झाँका, तो पाया, कोहरा तो मेरे अन्दर ही छाया है
और दिन ब दिन बढती ठण्ड ने उसे और गहराया है .
मैंने झटपट एक लौ जलाई , जिसमे कुछ दूर ही नज़र आया.
चलती रही..... वह लौ आज भी जल रही है, रौशनी तेज़ हुई है
गति भी बदली है मेरी , कदम बढ़ रहे हैं सावधानी से.
पर अच्छा है यह अहसास ; सावधानी से चलना
कोहरा और यह ठंडी हवा . विशाखा..