Saturday, August 27, 2011

मै कौन

कुछ समय पहले ही मैंने उस उम्रदराज़ महिला को देखा था 
जो चौराहे पर खरी रही थी, धूप की गर्मी ने जिसे  पिघला दिया था,
मोम बना दिया था! अचानक आ बैठी मेरे पास, हैरानी हुई मुझे!! 
मै व्याकुल हुई और पूछ बैठी,, कौन हो तुम ? आई हो क्यों मेरे पास 
क्या है मुझसे आस ? उसने जवाब दिया और कहा मै तो तुम ही हूँ !! 
तुम्हारा भविष्य, जो तुमने देखा था और अब वह सामने है,, तुम अकेली 
नही, बस चलो चलती जाओ पा लोगी अपना वर्त्तमान!!!!  और चली गयी   
अनंत में विलीन हो गयी,, अब भी सोचती हूँ !!! की आखिर मै कौन हूँ?? 

क्या यह केवल सवाल है या मेरा अस्तित्व ?? जो भी है!!! बस है..
न सवाल न ही कोई जवाब. बस अहसास!!!!!!

विशाखा.....

















Saturday, May 7, 2011

बेटी रानी-रानी बेटी

जब जन्म लिया था , जब निकली थी गर्भ से 
तभी ही पिता के आँखों में सपने देखे थे मैंने 
मेरे लिए जो कि धुन्दले थे स्पष्ट न था कुछ- भी 
मेरे लिए.

हाँ 'माँ ' वही जिसने जन्म दिया इस बच्ची को !
उसकी आँखों में भी देखे मैंने सपने मेरे खातिर 
जो पिता से भिन्नतर थे . 

माँ कहती  (रानी बेटी),, पिता कहते (बेटी रानी ) 
दोनों में बड़ी उलटबांसी देखी मैंने.

अस्तीत्व की लड़ाई "बेटी" या "रानी ",
खुद को ढूँढती   थी , उस बचपन की मासूम निगांहों से 
माँ की आँखों और पिता की धुंदली आँखों में.

बड़ा राज़ है यहां माँ की आंखे किसान के खेत की तरह 
पिता की रेगिस्तान के रेत की तरह . 
इसी उहापोह में बढ़ी , तब भी इसी सवाल को ढोती रही ,
पिता की ऑंखें रेगिस्तान से क्यूँ मिलती है ?जो दिखता कुछ 
है ,, और है और !

मेरे पिता की आँखों में पानी भी मृग- मरीचिका लगी है मुझे 
जब -जब वो बही  है .

उस रेगिस्तान में मै जाउंगी एक बार जब तपन कम 
होती है ढूँढूउँगी   मै उसके अन्दर मानसरोवर ...
क्यूँ- कि मै जानती हूँ मेरे पिता की आँखों में जो धुन्दलापन 
है वह यूँ ही नहीं है ! कुछ भी यूँ ही नहीं होता ...


विशाखा......


Friday, May 6, 2011

सपना



 तस्लीमा ने कहा सपने मर जाते है, और पाश ने कहा,
सबसे बुरा होता है, सपनो का मर जाना,
मै कह्ती हूं,
सपने! सपने कभी मरते  नहीं, हम दफना देते हैं , 
उसे अपने ही गहरे तल में. हर दिन नया सपना 
दिन के उजाले के साथ आता है , पर उस तल 
तक पहुँच नहीं पाता है. सपने मरा नहीं करते 
हम! हम उन्हें मार देते हैं दुविधाओं के जाल
 में फांस कर. 
दिक्कतों के सिरहाने रख छोर देते हैं 
देखो ! वह अब भी साँस ले रहा है, हमारी धरकनों 
की आड़ में . उसे सहलाओ, पुचकारो, वह सहमा है
डरा है , किसी ने ज़िंदा ही दफना दिया था! वह सपना
जो हमने कल देखा था.
वह आज ही तरोताजा हो निकला है
किसी सुन्दर सी मूरत की तरह ,
उसमें प्राणार्पण कौन करे? 
हमारा सपना हम ही देंगे उसे प्राण .
पर ज़हन में कौंध गयी एक बात 
जब सपने को लगाती हूँ हाथ , 
कई सर और कई हाथ थाम लेते हैं 
हमारे पांव को  जब हम उठाते है 
सपने को सहलाने को, हम वहीं गड  
जाते हैं अधमरे से रह जाते हैं,
 शरीर छूटने जब लगता है,
धड़कन रुक जब जाती है . 
सपने मरते नहीं हम धड़कन 
तले दफ़न कर उड़ जाते हैं,
सपना वहीँ छूट जाता है 
हमारे सिहाने के नीचे
हम नहीं! हमारा सपना,
 जो की अब सांस लेता है 
आहें भरता है, बस कहता है, सुनो 
गौर से उसकी आवाज़ सुनाई देती है
 के वह वहीं बैठा है .

विशाखा ....

Tuesday, April 26, 2011

एहसास


हर किरण सूरज का, एक नए दिन की शुरुआत!
एक नयी मंजिल की तलाश,
एक नयी ज़िन्दगी की तलाश,
और मैं खानाबदोश हो जाती हूँ .
तमाशा बनता है मेरा रोजमर्रा.

हम नौटंकी के किरदारों सा पार्ट निभाते जाते, 
कुछ न सुनने, कुछ न देखने वाले लोग ताली
बजाते जाते ; नौटंकी का एक बड़ा हिस्सा बनते!

यह जो बात मै कहना चाहती हूँ, वह सुनने वाली नहीं है, 
क्योंकि यह बेतुकी सी लग सकती है, और बात यह कि
यहाँ ; इस दुनियां में जहाँ की बात मैं करती हूँ , वह मुर्दों 
का आशिआना है,
चलते-फिरते मुर्दों का!
यम के देवता का भी निवास है यहाँ
पर वे कभी-कभार ही दीखते है, 
उस रोज़ से नचिकेता जिस दिन आया था
जिंदगी का  एहसास दिलाया था,
यम के दूत क्या!!
खुद यम थक गए
मुर्दा शारीर को ढोते
बेजान से खुद बन गए. 

आज इस नयी किरण से आस है,
तमाशा न बने रोज़मर्रा मेरा!
मै अहसास करूँ सुनने, देखने वालों को .
वैसे बेतुकी हैं ये बातें.
मैं जानती हूँ मुर्दे!!! ज़िन्दगी नहीं बन सकते.
लेकिन इस उलट-पलट दुनियां में 
इस मृत्युलोक में मुर्दा ही बोलते हैं , 

अहसास से परे ये ज़िंदा- मुर्दे ही तो हैं, काठ के  मानव !!!
    
विशाखा .....

Monday, April 25, 2011

धडकन

नहीं जानती मैं के मै कौन हूँ , 
जानना भी नहीं चाहती !
जानने से तकलीफ होती है ,
एक बार जानना चाहा था 
खुद को मैंने .!

एक वीरान सड़क से गुज़र रही थी 
सड़क चौड़ी थी लम्बी थी, सूरज के सातों 
घोड़ों की टाप का प्रतिबिम्ब  नज़र आता  था  ,
 रथ के पहियों की घर्राहट साफ़ सुनाई पड़ती थी.

मै बस बढती जाती थी ,कि एक दिन घोड़ों की टाप 
धीमी पड़ी, और सड़क बहने लगी, रथ नाव बना और घोड़े 
नाविक , मै स्थिर हो देखती रही इस चाल को, इस व्यूह को. 
जो रोज़ रचा जाता है मेरे लिए ! हर सुबह अपनी ही बनाई
सड़क के किनारे बैठ,सुनती हूँ सूरज के घोड़ों की टाप, 
जो मेरी धड़कन है.

विशाखा

Saturday, April 23, 2011

मैं हवा हूँ , नदी भी! बहती हूँ और बहती जाती हूँ , 
ओस का बूंद पीती , हवा पर जीती......हूँ !
मैं एक पंख वाली चिड़िया हूँ .

 मैं तो एक पहेली हूँ , उलट पलट इस दुनिया से भ्रमित,  
मैं  एक पंख वाली चिड़िया हूँ. 

उस नदी किनारे वाली वृक्छ की डाल पर रहती हूँ 
नदी मेरा आइना है , कभी वो मुझ में बहती है , 
कभी मैं  उसमें, हवा मेरे संग डाल पर बैठ गुनगुनाती 
है, बादल हलके फुलके बादल आ मेरे पास ठहरते  हैं 
उड़ने क़ी प्रेरणा देते है. 

सूरज रोज मेरे सिरहाने बैठता है अग्नि प्रज्वलित 
करता है, मैं उसकी इक उम्मीद हूँ ,,
इसी उम्मीद के  दामन से रोज़ खुद को कसती हूँ और कसती 
ही जाती हूँ .  मैं नदी हूँ बहती ही जाती हूँ , मैं हवा हूँ लहराती 
जाती हूँ , मैं एक पंख वाली चिड़िया हूँ . 

मैं अनोखी हूँ अलबेली हूँ ,मैं एक पंख वाली चिड़िया हूँ! 

वि्शाखा…