हर किरण सूरज का, एक नए दिन की शुरुआत!
एक नयी मंजिल की तलाश,
एक नयी ज़िन्दगी की तलाश,
और मैं खानाबदोश हो जाती हूँ .
एक नयी ज़िन्दगी की तलाश,
और मैं खानाबदोश हो जाती हूँ .
तमाशा बनता है मेरा रोजमर्रा.
हम नौटंकी के किरदारों सा पार्ट निभाते जाते,
कुछ न सुनने, कुछ न देखने वाले लोग ताली
बजाते जाते ; नौटंकी का एक बड़ा हिस्सा बनते!
बजाते जाते ; नौटंकी का एक बड़ा हिस्सा बनते!
यह जो बात मै कहना चाहती हूँ, वह सुनने वाली नहीं है,
क्योंकि यह बेतुकी सी लग सकती है, और बात यह कि
यहाँ ; इस दुनियां में जहाँ की बात मैं करती हूँ , वह मुर्दों
का आशिआना है,
चलते-फिरते मुर्दों का!
यम के देवता का भी निवास है यहाँ
पर वे कभी-कभार ही दीखते है,
चलते-फिरते मुर्दों का!
यम के देवता का भी निवास है यहाँ
पर वे कभी-कभार ही दीखते है,
उस रोज़ से नचिकेता जिस दिन आया था
जिंदगी का एहसास दिलाया था,
यम के दूत क्या!!
खुद यम थक गए
मुर्दा शारीर को ढोते
बेजान से खुद बन गए.
जिंदगी का एहसास दिलाया था,
यम के दूत क्या!!
खुद यम थक गए
मुर्दा शारीर को ढोते
बेजान से खुद बन गए.
आज इस नयी किरण से आस है,
तमाशा न बने रोज़मर्रा मेरा!
तमाशा न बने रोज़मर्रा मेरा!
मै अहसास करूँ सुनने, देखने वालों को .
वैसे बेतुकी हैं ये बातें.
वैसे बेतुकी हैं ये बातें.
मैं जानती हूँ मुर्दे!!! ज़िन्दगी नहीं बन सकते.
लेकिन इस उलट-पलट दुनियां में
लेकिन इस उलट-पलट दुनियां में
इस मृत्युलोक में मुर्दा ही बोलते हैं ,
अहसास से परे ये ज़िंदा- मुर्दे ही तो हैं, काठ के मानव !!!
विशाखा .....