Tuesday, April 26, 2011

एहसास


हर किरण सूरज का, एक नए दिन की शुरुआत!
एक नयी मंजिल की तलाश,
एक नयी ज़िन्दगी की तलाश,
और मैं खानाबदोश हो जाती हूँ .
तमाशा बनता है मेरा रोजमर्रा.

हम नौटंकी के किरदारों सा पार्ट निभाते जाते, 
कुछ न सुनने, कुछ न देखने वाले लोग ताली
बजाते जाते ; नौटंकी का एक बड़ा हिस्सा बनते!

यह जो बात मै कहना चाहती हूँ, वह सुनने वाली नहीं है, 
क्योंकि यह बेतुकी सी लग सकती है, और बात यह कि
यहाँ ; इस दुनियां में जहाँ की बात मैं करती हूँ , वह मुर्दों 
का आशिआना है,
चलते-फिरते मुर्दों का!
यम के देवता का भी निवास है यहाँ
पर वे कभी-कभार ही दीखते है, 
उस रोज़ से नचिकेता जिस दिन आया था
जिंदगी का  एहसास दिलाया था,
यम के दूत क्या!!
खुद यम थक गए
मुर्दा शारीर को ढोते
बेजान से खुद बन गए. 

आज इस नयी किरण से आस है,
तमाशा न बने रोज़मर्रा मेरा!
मै अहसास करूँ सुनने, देखने वालों को .
वैसे बेतुकी हैं ये बातें.
मैं जानती हूँ मुर्दे!!! ज़िन्दगी नहीं बन सकते.
लेकिन इस उलट-पलट दुनियां में 
इस मृत्युलोक में मुर्दा ही बोलते हैं , 

अहसास से परे ये ज़िंदा- मुर्दे ही तो हैं, काठ के  मानव !!!
    
विशाखा .....

Monday, April 25, 2011

धडकन

नहीं जानती मैं के मै कौन हूँ , 
जानना भी नहीं चाहती !
जानने से तकलीफ होती है ,
एक बार जानना चाहा था 
खुद को मैंने .!

एक वीरान सड़क से गुज़र रही थी 
सड़क चौड़ी थी लम्बी थी, सूरज के सातों 
घोड़ों की टाप का प्रतिबिम्ब  नज़र आता  था  ,
 रथ के पहियों की घर्राहट साफ़ सुनाई पड़ती थी.

मै बस बढती जाती थी ,कि एक दिन घोड़ों की टाप 
धीमी पड़ी, और सड़क बहने लगी, रथ नाव बना और घोड़े 
नाविक , मै स्थिर हो देखती रही इस चाल को, इस व्यूह को. 
जो रोज़ रचा जाता है मेरे लिए ! हर सुबह अपनी ही बनाई
सड़क के किनारे बैठ,सुनती हूँ सूरज के घोड़ों की टाप, 
जो मेरी धड़कन है.

विशाखा

Saturday, April 23, 2011

मैं हवा हूँ , नदी भी! बहती हूँ और बहती जाती हूँ , 
ओस का बूंद पीती , हवा पर जीती......हूँ !
मैं एक पंख वाली चिड़िया हूँ .

 मैं तो एक पहेली हूँ , उलट पलट इस दुनिया से भ्रमित,  
मैं  एक पंख वाली चिड़िया हूँ. 

उस नदी किनारे वाली वृक्छ की डाल पर रहती हूँ 
नदी मेरा आइना है , कभी वो मुझ में बहती है , 
कभी मैं  उसमें, हवा मेरे संग डाल पर बैठ गुनगुनाती 
है, बादल हलके फुलके बादल आ मेरे पास ठहरते  हैं 
उड़ने क़ी प्रेरणा देते है. 

सूरज रोज मेरे सिरहाने बैठता है अग्नि प्रज्वलित 
करता है, मैं उसकी इक उम्मीद हूँ ,,
इसी उम्मीद के  दामन से रोज़ खुद को कसती हूँ और कसती 
ही जाती हूँ .  मैं नदी हूँ बहती ही जाती हूँ , मैं हवा हूँ लहराती 
जाती हूँ , मैं एक पंख वाली चिड़िया हूँ . 

मैं अनोखी हूँ अलबेली हूँ ,मैं एक पंख वाली चिड़िया हूँ! 

वि्शाखा…