Saturday, March 9, 2013

शब्दों का तानाबाना 

मैं कुछ कहना नहीं चाहती ,
शब्दों  का तानाबाना बड़ा उलझाता है, जाल बुनता है,
फिर फांस लेता है, मैं चुप रहना चाहती हूँ।

चुप्पी का अर्थ गहराई में गोते लगाना है, शब्दों के बुनावट,
उसकी कसीदाकारी में उतरना है।

मैं अभिमन्यु बनती जा रही हूँ, जो कुरुक्षेत्र के मैदान
के बीच कौरवों से घिरा था, अपने ही बनाए चक्रव्यूह में फंसा था।
आज इस कुरुक्षेत्र और शब्दों के चक्रव्यूह, जो बनाए जाते हैं मेरे लिए
वह जो कौरवों की नारायणी सेना खड़ी होती है मेरे सामने!

एक आवाज़ आती है कानों में अस्वथामा हतो-वा (मारा गया)!!
और मैं टूट जाती हूँ गुरु द्रोण की तरह। वार किये जाते हैं,
फिर धराशायी हो जाती है एक  दीवार!
एक मजबूत स्तम्भ बचा है अभी, दृढ-प्रतिज्ञ योद्धा!
जो युगों से देखता आया है शब्दों के जाल को,
वह द्रिढनिश्चयी भी आज घायल हुआ!
वह लेटा रहा है, सदियों तक उस नुकीली शैया पर।

मैं कुछ कहना नहीं चाहती!!

विशाखा___________.

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