Saturday, March 9, 2013

अहिल्या 

कुछ न कुछ बीतता जाता है, देखती परखती रहती हूँ खुद को
कितनी बातें कितनी मुलाकातें खुद के साथ।

हर बार न जाने कितने तीर चलते हैं सामने के मैदानों से,
मेरे सीने में चुभते हैं पर घायल नहीं कर पाते, हर ज़ख्म कहती है!
कि  ज़रा सुन उस तीर के पैने  नोक की आवाज़, जो हवा को भेदता हुआ
तुझ तक पहुंचा है, यह चुभन मुझे तब तक अहसास दिलाती रहेगी
जब-तक मेरे मुलायम ज़ख्म सूख नहीं जाते
और मैं मजबूत शिलास्ताम्भ नहीं बन जाती.
शिलास्ताम्भ बनकर मौन नहीं हो जाती।

आज इस छण से मैं परिपक्व हो रही हूँ।
मुझमें कहीं अहिल्या समा गयी है या मैं अहिल्या बन रही हूँ।
इस इंतज़ार में कि राम आयेंगे!!!!!!
हे राम !!!!!


विशाखा ______.

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