Friday, May 6, 2011

सपना



 तस्लीमा ने कहा सपने मर जाते है, और पाश ने कहा,
सबसे बुरा होता है, सपनो का मर जाना,
मै कह्ती हूं,
सपने! सपने कभी मरते  नहीं, हम दफना देते हैं , 
उसे अपने ही गहरे तल में. हर दिन नया सपना 
दिन के उजाले के साथ आता है , पर उस तल 
तक पहुँच नहीं पाता है. सपने मरा नहीं करते 
हम! हम उन्हें मार देते हैं दुविधाओं के जाल
 में फांस कर. 
दिक्कतों के सिरहाने रख छोर देते हैं 
देखो ! वह अब भी साँस ले रहा है, हमारी धरकनों 
की आड़ में . उसे सहलाओ, पुचकारो, वह सहमा है
डरा है , किसी ने ज़िंदा ही दफना दिया था! वह सपना
जो हमने कल देखा था.
वह आज ही तरोताजा हो निकला है
किसी सुन्दर सी मूरत की तरह ,
उसमें प्राणार्पण कौन करे? 
हमारा सपना हम ही देंगे उसे प्राण .
पर ज़हन में कौंध गयी एक बात 
जब सपने को लगाती हूँ हाथ , 
कई सर और कई हाथ थाम लेते हैं 
हमारे पांव को  जब हम उठाते है 
सपने को सहलाने को, हम वहीं गड  
जाते हैं अधमरे से रह जाते हैं,
 शरीर छूटने जब लगता है,
धड़कन रुक जब जाती है . 
सपने मरते नहीं हम धड़कन 
तले दफ़न कर उड़ जाते हैं,
सपना वहीँ छूट जाता है 
हमारे सिहाने के नीचे
हम नहीं! हमारा सपना,
 जो की अब सांस लेता है 
आहें भरता है, बस कहता है, सुनो 
गौर से उसकी आवाज़ सुनाई देती है
 के वह वहीं बैठा है .

विशाखा ....

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