Monday, April 25, 2011

धडकन

नहीं जानती मैं के मै कौन हूँ , 
जानना भी नहीं चाहती !
जानने से तकलीफ होती है ,
एक बार जानना चाहा था 
खुद को मैंने .!

एक वीरान सड़क से गुज़र रही थी 
सड़क चौड़ी थी लम्बी थी, सूरज के सातों 
घोड़ों की टाप का प्रतिबिम्ब  नज़र आता  था  ,
 रथ के पहियों की घर्राहट साफ़ सुनाई पड़ती थी.

मै बस बढती जाती थी ,कि एक दिन घोड़ों की टाप 
धीमी पड़ी, और सड़क बहने लगी, रथ नाव बना और घोड़े 
नाविक , मै स्थिर हो देखती रही इस चाल को, इस व्यूह को. 
जो रोज़ रचा जाता है मेरे लिए ! हर सुबह अपनी ही बनाई
सड़क के किनारे बैठ,सुनती हूँ सूरज के घोड़ों की टाप, 
जो मेरी धड़कन है.

विशाखा

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